हर बंधन में हो आजादी की चाह ये जरूरी नहीहर बंधन में हो आजादी की चाह ये जरूरी नही

हर बंधन में हो आजादी की चाह ये जरूरी नही शर्त बस इतनी के बेड़ी मोहब्बत और ख़लूस कि हो मजबूरी की नही तू चाहता है मुझको इतना काफी है

एक तकिये पर ही दोनों संग संग बूढ़े होएक तकिये पर ही दोनों संग संग बूढ़े हो

कभी तुम थक कर तकिये पर चूर हो जाओ इतनी इजाजत तो है तुमको पर ये नही के मुझसे दूर हो जाओ मौसम तो आते जाते रहेंगे हर बरस इस

हहहह

लाल रंग मेरा पसंदीदा तो नहीं मगर मुझे बहुत प्यारा था लाल रंग की चूड़िया लाल रंग की बिंदी होंठो पे हो लाली लाल गाल भी शरमाकर हो लाल इन्ही

बस मुस्करा देनाबस मुस्करा देना

काश कभी आंखे खोलू तो तुम सामने हो मेरे तुम मुझे देखकर बस हमेशा की तरह मुस्करा देना मैं भी पहले जैसे शरमा जाउंगी चेहरे की झुर्रियां अचानक गायब सी

कोरोना पर कविता carona par kavitaकोरोना पर कविता carona par kavita

ऐसे दिन फिर कब आएंगे के सब दुश्मनी जात पात भूल, मानव का धर्म निभाएंगे सोना चांदी की फिक्र नही रोटी चावल मैं भी शुक्र मनाएंगे फैशन की अब कोई

तितलीतितली

नीली, पीली औ’ चटकीली पंखों की प्रिय पँखड़ियाँ खोल, प्रिय तिली! फूल-सी ही फूली तुम किस सुख में हो रही डोल? चाँदी-सा फैला है प्रकाश, चंचल अंचल-सा मलयानिल, है दमक